राज्य और केंद्र की राजनीति में एक बार फिर जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच टकराव की चर्चा तेज हो गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या IAS और IPS अधिकारी मंत्री-सांसदों की बात नहीं सुन रहे? इस बहस को और हवा तब मिली, जब एक केंद्रीय मंत्री का पत्र सामने आया, जिसमें अफसरशाही के रवैये पर नाराज़गी जाहिर की गई है।
सूत्रों के अनुसार, मंत्री ने अपने पत्र में कहा है कि कई बार जनहित से जुड़े मामलों में भी अधिकारियों की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि जनता की समस्याएं उठाने के बावजूद फैसले टाले जाते हैं या फाइलें लंबित रखी जाती हैं। इससे न सिर्फ विकास कार्य प्रभावित होते हैं, बल्कि जनता में भी गलत संदेश जाता है।
वहीं, प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि वे नियम-कानून के दायरे में रहकर काम करते हैं और कई मामलों में राजनीतिक दबाव के चलते निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। अधिकारियों का मानना है कि कानून और प्रक्रिया से समझौता करना संभव नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह टकराव सत्ता संतुलन और जिम्मेदारियों की स्पष्टता से जुड़ा हुआ है। जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं, जबकि अफसरशाही को प्रशासनिक नियमों का पालन करना होता है। ऐसे में तालमेल की कमी टकराव का कारण बन रही है।
अब सभी की नजरें इस पर टिकी हैं कि सरकार इस विवाद को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाती है, ताकि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय बन सके।





