राजधानी जयपुर के एसएमएस अस्पताल की ‘बर्न’ व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हाईटेंशन लाइन की चपेट में आकर झुलसी 12 वर्षीय बच्ची को अस्पताल लाए जाने पर परिजनों ने आरोप लगाया कि अस्पताल प्रशासन ने उसे “बाहरी मरीज” बताकर फ्री इलाज से इनकार कर दिया। इस कारण गंभीर हालत में मौजूद बच्ची को इलाज के लिए काफी देर तक भटकना पड़ा।
परिजनों का कहना है कि बच्ची करीब 70 प्रतिशत तक झुलसी हुई थी, इसके बावजूद उसे तुरंत भर्ती नहीं किया गया। कागजी औपचारिकताओं और अस्पताल स्टाफ की उदासीनता के चलते बच्ची को करीब 3 घंटे 30 मिनट बाद बर्न वार्ड में एडमिट किया गया। इस देरी से बच्ची की हालत और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है।
घटना के बाद अस्पताल की बर्न यूनिट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। मरीजों के परिजनों और सामाजिक संगठनों ने इसे मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी बताया है। उनका कहना है कि आपात स्थिति में मरीज की हालत प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि उसका पता या दस्तावेज।
मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल प्रशासन से रिपोर्ट तलब की है। अधिकारियों का कहना है कि यदि जांच में लापरवाही पाई गई, तो जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह घटना सरकारी अस्पतालों में आपात सेवाओं की हकीकत को उजागर करती है।





