एक बेहद संवेदनशील और समाज को झकझोर देने वाले मामले में हाईकोर्ट ने 12 साल की नाबालिग बेटी से दुष्कर्म करने वाले पिता की अपील खारिज करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने अपने सख्त फैसले में कहा कि यह अपराध केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भरोसे का कत्ल और नारी गरिमा पर गंभीर हमला है, जिसे किसी भी हाल में माफ नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि पिता का स्थान एक रक्षक का होता है, लेकिन आरोपी ने उसी रिश्ते को शर्मसार किया। ऐसे मामलों में नरमी समाज के लिए गलत संदेश दे सकती है। अदालत ने साफ कहा कि नाबालिग बच्चियों की सुरक्षा सर्वोपरि है और इस तरह के जघन्य अपराधों पर कठोर सजा ही न्याय का सही मार्ग है।
मामले में निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को चुनौती देते हुए आरोपी ने अपील दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने सबूतों, मेडिकल रिपोर्ट और पीड़िता के बयान को मजबूत मानते हुए अपील खारिज कर दी।
इस फैसले को महिला सुरक्षा और बच्चों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। न्यायालय के इस निर्णय से समाज में स्पष्ट संदेश गया है कि रिश्तों की आड़ में होने वाले अपराधों को कानून बर्दाश्त नहीं करेगा।





