‘मस्ती 4’ रिलीज के बाद दर्शकों के बीच भारी निराशा का माहौल देखने को मिल रहा है। जिन उम्मीदों के साथ इसे मजेदार और धमाकेदार वापसी के रूप में प्रचारित किया गया था, फिल्म उन उम्मीदों पर कहीं भी खरी नहीं उतरती। शुरुआत से ही फिल्म की कहानी बिखरी हुई लगती है और हास्य के नाम पर ऐसा कंटेंट परोसा गया है जो न केवल पुराना लगता है, बल्कि कई जगहों पर दर्शकों को असहज भी कर देता है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, दर्शकों का धैर्य टूटता नजर आता है और ऐसा महसूस होता है कि यह फिल्म मनोरंजन नहीं बल्कि परीक्षा लेने आई है।
रितेश देशमुख, विवेक ओबेरॉय और आफताब शिवदासानी जैसे कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद उनकी कॉमिक टाइमिंग फीकी पड़ गई है। संवादों में ऊर्जा की कमी और कमजोर निर्देशन ने फिल्म को और भी नुकसान पहुंचाया है। तुषार कपूर, नर्गिस फाखरी और अरशद वारसी जैसे कलाकार भी छोटे और प्रभावहीन रोल में नजर आते हैं। महिला किरदारों को सिर्फ ग्लैमर जोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया है, जिससे कहानी और कमजोर लगती है।
कमजोर कहानी, बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले, खराब निर्देशन और औसत एक्टिंग के कारण ‘मस्ती 4’ दर्शकों को जोड़ने में पूरी तरह असफल साबित होती है। दर्शकों का मानना है कि यह फिल्म देखने की बजाय समय किसी और बेहतर काम में लगाया जा सकता है।





